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210502 : The Magic Number

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  वैसे तो भाग्य या 'किस्मत' जैसे शब्द को किसी एक परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता। ​कहने वाले अक्सर कह देते हैं कि जो परम-शक्ति ने लिख दिया है, वही होना है; आपके हाथ-पैर मारने से कुछ बदलने वाला नहीं। जैसा कि कबीर दास जी की उलटबांसी या साखियों का भाव हमें समझाता है: ​ "चिंता ताकी कीजिए, जो अनहोनी होय। अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय॥" ​इसके ठीक उलट एक दूसरा पक्ष भी है—जो किसी अदृश्य शक्ति या लकीरों में बिल्कुल यकीन नहीं रखता। जिसका मानना है कि यह समूचा संसार एक 'रैंडम' सिलसिले पर चल रहा है; यहाँ किसी अलौकिक शक्ति का कोई हस्तक्षेप नहीं। यह वह तबका है जो केवल और केवल श्रम को पूजता है और फ़िराक़ गोरखपुरी के इस अंदाज़ में जीता है: ​ "हमसे पूछो ज़ब्त-ए-इश्क़ की बातें, हमने तक़दीर को तदबीर से बदलते देखा है।" ​लेकिन विश्वास, आस्था, अंधविश्वास, कर्म और 'हाथ की लकीरों' की इस अंतहीन बहस को अगर थोड़ी देर के लिए दरकिनार कर दें, तो एक ऐसा कड़वा गुणांक (Factor) सामने आता है जिस पर हमारा ज़ोर नहीं चलता— हमारा पिन-कोड (PIN-Code)। ​साधारण शब्दों में कहें तो हम...

Part-2 : Inside The Train {1926 In 2026}

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  Before Reading This, Please Read Part-1 from my Blog Account.... < रात का अंतिम पहर अब लग चुका था। गरीब रथ के नाम वाली ट्रेन में अमीरों के बराबर किराया देकर हम अपनी सीटों को ढूंढ रहे थे। एक महीने पहले भी बुकिंग करने के बाद दोनों की सीट कंफर्म नहीं थी, पर मेरा दोस्त पेशे से इंजीनियर था, तो उसने कोई तरकीब निकाल कर यह समस्या तो हल कर ली थी। सीटों की मारामारी बिहार जाने वाली प्रत्येक रेलगाड़ी में होती ही है, क्योंकि अधिकांश कार्यरत बिहारी लोग अपने घरों से बाहर ही रहते हैं। इस समस्या को अर्थशास्त्र की भाषा में पलायन कहा जाता है। यूं तो इसी के नाम पर ही बिहार में चुनाव लड़े जाते हैं, सरकारें बनाई जाती हैं, फिर भी इसकी संख्या प्रत्येक वर्ष बढ़ रही है और भविष्य में भी इस पर कोई सकारात्मक सुधार की संभावना नहीं है। पलायन के विचार को सोचते-सोचते मैं अपनी सीट पर पहुँच गया। मेरी सीट तो सबसे ऊपर थी—सामान्यतः जो सीट कोई नहीं लेना चाहता। साइड लोअर की सीट तो भारतीय रेल को दुगने दाम में बेचना चाहिए, इससे भारतीय रेल के जो हालात हैं उसमें आमूल-चूल सुधार होगा। भारतीय रेल दिन-प्रतिदिन प्रगति कर रह...

Depression: First Stage of This World -Scientific but Not Scientific

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  बदलती दुनिया, घटती एकाग्रता और डिप्रेशन की आहट संसार बहुत तेज़ी से बदल रहा है—इतनी तेज़ी से, जिसकी कल्पना हम और आप शायद नहीं कर सकते। रोबोटिक्स, स्टार्टअप्स और महंगाई दिन-प्रतिदिन खरगोश की चाल से भाग रहे हैं। इस तेज़ी से बदलते संसार में मानव का मानसिक विकास कछुए की गति से आगे बढ़ रहा है। 15 सेकंड में अपना विषय बदलने की आदत हमें एक गंभीर महामारी की ओर ले जा रही है। वर्तमान समय में एकाग्रता प्राप्त करना माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने जैसा कठिन कार्य प्रतीत होता है। नींद को छोड़ दें, तो शायद ही आप 5 मिनट बिना किसी मानसिक अवरोध के एकाग्रचित्त होकर बैठ सकते हैं। यही कारण है कि लोगों का स्लीपिंग साइकिल (निद्रा चक्र) अनियंत्रित हो गया है। दिनभर की अनावश्यक जानकारियाँ—जिनका हमारे जीवन से कोई लेना-देना नहीं है—चाहे वह रिश्तेदारों का मूड हो, किसी परिचित की ट्रिप का स्टेटस हो, या फिर राजनीति से जुड़े अनुपयोगी पोस्ट्स, रातभर हमारे सबकॉन्शियस माइंड (अवचेतन मन) में एक मेमोरी कार्ड की तरह स्टोर होती रहती हैं। जो लोग पर्याप्त नींद नहीं ले पाते, उनमें उच्च रक्तचाप, मोटापा, बाल झड़ना और दृष्टि कमज़ोर होने...

Part-1: 2026 में 1926 (बदलती दुनिया में भारतीय गांव) [The Untouched India - A Travelogue] Part-1

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  « बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना » — यह कहावत जो मैंने बचपन में सुनी थी, आज उस शादी में मैं अब्दुल्ला के किरदार में था; क्योंकि शादी थी मेरे मित्र के मित्र आयुष सिंह की, जिससे मैं सिर्फ़ तीन घंटे ही मिला था। आज मैं उसकी शादी में जा रहा था, लगभग 900 किलोमीटर दूर। अब समझिए कितनी दूरी, पहले रिश्ते की और उसके बाद  मील की। मन में जाने का सिर्फ़ एक कारण था—शायद कुछ नया देखने, सुनने, जानने, ढूंढने और महसूस करने को मिलेगा। महीना है रमज़ान का, रोज़ा है छठवाँ, दिन मंगलवार का। सफ़र की शुरुआत होती है शाम 5:00 बजे से, जिसकी तैयारी मैं और मेरा दोस्त पिछले दो महीनों से कर रहे थे। दोनों के मन में व्याकुलता थी तो एक मित्र-यात्रा की, जिसकी योजना जब हम 11वीं में थे तब बनाया करते थे—साथ में यहाँ घूमेंगे, वहाँ घूमेंगे, पूरी दुनिया घूमेंगे। दुनिया तो शायद हम अभी न घूम पाएँ क्योंकि हम दोनों की जेब में अभी भारतीय नोट न होकर सरकारी इम्तिहानों के प्रवेश पत्र हैं, और वहाँ घूमना इसलिए भी नहीं हो पा रहा क्योंकि घूमने की रकम इन इम्तिहानों के परीक्षा शुल्क ने ले रखी थी। फिर भी हम घर के पैसों में अपना हि...